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क्या बस्तर बन रहा है कबीरधाम-जिन आदिवासियों के विश्वास और सहयोग के दम पर नक्सलियों के ताबूत में पुलिस ने कील ठोंकी थी,इनाम में बेकसूर आदिवासी को नक्सली बताकर मार दिया गया!

क्या बस्तर बन रहा है कबीरधाम-जिन आदिवासियों के विश्वास और सहयोग के दम पर नक्सलियों के ताबूत में पुलिस ने कील ठोंकी थी,इनाम में बेकसूर आदिवासी को नक्सली बताकर मार दिया गया!
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0 गोंड़ आदिवासी संगठन ने MP पुलिस पर पर लगाये गंभीर आरोप।

0 दो दिन पहले जिले के दो आदिवासी पर गढ़ी में मछली पकड़ते समय मारी थी गोली, एक कि मौके पर ही हुई मौत।

0 नेताओ की नई आई प्रतिक्रिया।

ताहिर खान
कवर्धा- जिन आदिवासियों के जल जंगल जमीन में रहकर उनके सहयोग से नक्सलियों पर काबू पाने के लिए मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ की पुलिस संयुक्त अभियान के दौरान ताबड़तोड़ कार्रवाई करती है और नक्सलियों को मारने के अलावा उनसे विस्फोटक सामग्री भी बरामद करते हैं उसी विश्वास की धज्जियां उड़ते हुए दिखाई दे रहा है। ग्रामीणों के मुताबिक बेकसूर आदिवासी को गोली मारकर में भरोसा और सहयोग का इनाम मौत के रूप में दिया है। सामाजिक नेता सुमिरन सिंह व कामु बैगा ने बताया कि कबीरधाम जिले के झलमला थाना के अंतर्गत बालसमुंद गांव के दो आदिवासी नेमसिंह व झाम सिंह धुर्वे छत्तीसगढ़ की सीमा पर लगा हुआ गढ़ी गॉव जहां मछली मारने के लिए हमेशा की तरह 6 सितंबर को भी गए हुए थे इस दौरान मध्य प्रदेश पुलिस सर्चिंग में निकली हुई थी उस दौरान क्या स्तिथि निर्मित हुई के दोनों आदिवासियों पर गोली चलानी पड़ी, जबकि मछली मारने का डंडा लेकर दोनों आदिवासी पुलिस से डरकर छत्तीसगढ़ की सीमा की ओर भाग रहे थे, बिना पुख्ता जानकारी के उन्हें नक्सली बताकर गोली मार दिया गया, जिसमें पीछे दौड़ रहे झामसिंह की मौके पर ही मौत हो गई वहीं आगे दौड़ रहे आदिवासी नेमसिंह के डंडे को गोली छूती हुई निकल गई, जैसे तैसे गांव पहुंचकर नेमसिंह ने घटना की जानकारी दी लोगों का गुस्सा उबल पड़ा आनन-फानन में एमपी पुलिस ने इसे नक्सली बता दिया। मृतक का गमगीन और गुस्से से भरे माहौल के बीच बालसमुंद गांव में अंतिम संस्कार किया गया जिसके बाद यह मामला मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में अन्य लोगों के संज्ञान में आया। इस मामले को लेकर गोंड आदिवासी संगठन दोषियों पर कार्रवाई करने की मांग पर अड़ गया है।

होनी चाहिए उच्च स्तरीय जांच

इस गंभीर मामले में मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ की सरकार को आपस में बात कर एक जांच कमेटी गठित करने चाहिए ताकि आदिवासी को न्याय मिल सके साथ ही हक़ीक़त सामने आ सके। पुलिस यदि उसे नक्सली बता रही है तो आधारों की भी जांच होनी चाहिए। ग्रामीणों की माने तो झाम सिंह बहुत सीधा-साधा सामान्य व्यक्ति था, नक्सलियों से इनका दूर दूर से कोई संबंध नहीं था। हमेशा से ही वह मछली मारने के लिए छत्तीसगढ़ की सीमा से लगे उस जगह में जाता रहा है इस घटना की जानकारी MP पुलिस ने झलमला थाने में भी नहीं दिया था जबकि दोनों जगह की पुलिस हमेशा संयुक्त ही नक्सलियों के विरुद्ध कार्रवाई करती है। कई ऐसे कारण हैं जिसके चलते पुलिस पर जानबूझकर गोली मारने का आरोप आदिवासी संगठन लगा रहे हैं।

विश्वास और नक्सल के खिलाफ अभियान को लग सकता है गहरा आघात

अगर इस मामले को सरकार और स्थानीय जनप्रतिनिधि गंभीरता से लेते हुए आदिवासी की मौत की जांच व न्याय नहीं दिला पाए तो इससे नक्सली खात्मे के अभियान को जबरदस्त धक्का लग सकता है क्योंकि पुलिस इन्हीं आदिवासियों के दम पर नक्सलियों के छाती पर चढ़कर गोली मारते हैं। न्याय नही मिला तो पुलिस को आगे भरोसा दिलाने में थोड़ी दिक्कत हो सकती है। क्योंकि अब वे नक्सलियों और पुलिस दोनों तरफ से गोलियों के शिकार हो रहे है, जिसका उदाहरण बस्तर में कई बार देखने मिल चुका है।

आदिवासीयो के लिए कशमकश की स्थिति

आदिवासियों को एक ओर नक्सली पुलिस का मुखबिर बताकर तो वही दूसरी ओर नक्सली बतातकर पुलिस गोली मार देते है। कबीरधाम जिले में भी एमपी पुलिस के द्वारा मारे गए आदिवासी को नक्सली बताकर मार दिया गया। जिसे स्थानीय ग्रामीण और समाज प्रमुख बेकसूर और सामान्य नागरिक बता रहे है। आदिवासी दोनों तरफ से गोली खा रहे हैं अगर यही स्थिति बनी रही तो आने वाले समय पर आदिवासीयो का विश्वास जीत पाना मुश्किल होगा और नक्सलियों की जानकारी साझा करने में हिचकिचाएंगे, जिसके चलते नक्सलियों को क्षेत्र विस्तार करने का मौका मिल सकता है , ऐसा ना हो इसलिए ग्रामीणों के मुताबिक बेकसूर आदिवासी की मौत मामले में न्याय मिलना जरूरी माना जा रहा है और आदिवासी संगठन भी यही मांग कर रहा है। पूर्व पुलिस अधीक्षक डॉ लाल उमेद सिंह आदिवासियों का विश्वास जितने में काफी हद तक सफल हुए थे, जिसके चलते नक्सलियों को भी मार गिराया गया था और नक्सली मूवमेंट जिसके बाद से नहीं के बराबर दिख रहे हैं, इसी विशवास को कायम रखने की चुनौती है।

गढ़ी में कल सर्वदलीय बैठक आयोजित

सूत्रों के मुताबिक इस मामले को लेकर गोंड आदिवासी संगठनों ने कड़ी प्रतिक्रिया जताते हुए गढ़ी में कल संयुक्त एक बैठक का आयोजन किया गया है जिसमें आगे की रणनीति पर फैसला होगा। संगठन चाहता हैं कि इसकी उच्च स्तरीय जांच हो यदि ऐसा अभी नहीं हुआ तो आने वाले समय में यह परंपरा बन जाएगा।

एक करोड़ मुआवजा और सरकारी नौकरी की मांग

समाज के प्रतिनिधि सुमिरन धुर्वे,प्रभाती मरकाम व कामु बैगा ने एमपी पुलिस पर बेकसूर आदिवासी को गोली मारने के आरोप लगाते हुए कहा है कि मामले की जांच हो और दोषियों पर हत्या का मुकदमा दर्ज होना चाहिए साथ ही मृतक के परिवार को एक करोड़ मुआवजा राशि के साथ एक सरकारी नौकरी भी देने की मांग रखेंगे।

किसी भी नेता का नहीं आई प्रतिक्रिया

जिन आदिवासियों के दम पर छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में सरकारी बनती है उन्ही आदिवासियों को जब जनप्रतिनिधियों के साथ की जरूरत पड़ने पर कोई साथ खड़ा हुआ नहीं दिख रहा है, अभी तक सत्ता या विपक्ष के कोई भी नेता या जनप्रतिनिधि इस मामले को लेकर प्रतिक्रिया जाहिर नहीं किए हैं । हर छोटी छोटी चीजों में नेतागिरी करने वाले नेता इस मुद्दे से अपने आप को अलग किए हुए हैं।

एमपी पुलिस की नक्सली साबित करने की साजिश?

समाज के के नेता सुमिरन सिंह ने एमपी पुलिस पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि झाम सिंह को मारने के बाद नक्सली साबित करने की साजिश की जा रही है जबकि वह एक सामान्य नागरिक था आदिवासियों के साथ बस्तर में पहले भी घटना घटित हो चुकी है। मृतक के पास दाल, चावल, आटा,नमक और एक भरमार बंदूक रख दिया गया है। ध्यान से देखने पर पता चलता है कि सभी पैकेट नए थे और कोई भी पैकेट खुला नही ऐसा प्रतीत होता है कि तुरंत ही दुकान से लाकर सामान को रखा गया है।

Updated : 10 Sep 2020 12:58 PM GMT
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