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संतान की लंबी उम्र के लिए माताओं ने रखा हलषष्ठी व्रत,विधिविधान से पूजा के बाद छठ माता की कथा सुनी।

संतान की लंबी उम्र के लिए माताओं ने रखा हलषष्ठी व्रत,विधिविधान से पूजा के बाद छठ माता की कथा सुनी।
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0 इसी दिन भगवान श्रीकृष्ण के बड़े भाई बलराम का जन्म हुआ था।

ताहिर खान/ कवर्धा. संतान की लंबी आयु के लिए रविवार को माताओं ने हलषष्ठी व्रत रखा तथा मंदिरों में विधि विधान के साथ पूजा अर्चना किए. पूजा पाठ का सिलसिला सुबह से लेकर शाम तक जारी रहा.
भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की षष्ठी को यह पर्व मनाया जाता है. इसी दिन भगवान श्रीकृष्ण के बड़े भाई बलराम का जन्म हुआ था. भगवान बलराम का प्रधान शस्त्र हल है. उन्हीं के नाम पर इस पर्व का नाम हलछठ या हलषष्ठी पड़ा. व्रती महिलाओं ने उन वस्तुओं का त्याग किया जिनकी पैदावार जुते हुए खेत में होती है. माताओं ने अनाज, दूध, घी से परहेज कर फल और फलाहार का प्रयोग किया. सुबह महिलाओं ने महुए का दातून किया. व्रत के लिए आवश्यक भैंस का दूध, घी, दही, गोबर, महुए का फल, फूल एवं पत्ते तिन्नी का चावल, कुश आदि से पूजा अर्चना की. पूजा के दौरान भैंस के गोबर से घर की दीवार पर हलछठ माता का चित्र बनाया. विधिविधान से पूजा के बाद छठ माता की कथा सुनी. आरती करने के बाद पूजा स्थल पर ही महुए के पत्ते पर प्रसाद ग्रहण किया. यह जिले में सभी जगह मनाया गया. सुबह से ही जगह-जगह महिलाओं की भीड़ देखी गई.


बिना हल चले चीजों का उपयोग
हलषष्ठी पर्व पर महिलाएं बिना हल चले हुए जमीन से उपजे अनाज, पसहर चालव का सेवन किया. इसलिए इसमें पसहर चावल जो अपने आप उगता है उसे खाया जाता है. इसके साथ ही गाय के दूध, दही, घी का सेवन करना भी मना है. इसलिए इस दिन भैंस के दूध, दही, घी का सेवन किया गया. कमरछठ के दिन हल को छूना तो दूर हल चली जमीन पर भी महिलाएं पैर नहीं रखती और हल चले अनाज को भी ग्रहण नहीं करती.

मंदिरों में लगी श्रद्धलुओं की भीड़


शहर के शिव मंदिरों सहित देवी मंदिरों में कमरछठ की सामूहिक पूजा के लिए महिलाओं की कतार लगी रही. दोपहर बाद मंदिर में एक के बाद समूह में आई महिलाओं ने पूजा की और कथा भी सुनी. जो महिलाएं मंदिर तक नहीं पहुंची उन्होंने घर के पास ही सगरी बनाकर और पास-पड़ोस की महिलाओं के साथ मिलकर पूजा की। मधु तिवारी ने बताया कि हर वर्ष सभी महिलाएं मिलकर उनके यहां पूजा करती हैं. संतान की लंबी उम्र के लिए यह व्रत काफी फलदायी होता है.


बलराम का जन्म दिन
पंडित केदार प्रसाद तिवारी ने बताया कि मान्यता है कि हलषष्ठी के दिन बलराम का जन्म हुआ था और उनके दो दिन बाद जन्माष्टमी को कृष्ण का जन्म हुआ था. वही भगवान कार्तिकेय का जन्म भी हलषष्ठी के दिन माना जाता है. बलराम को शस्त्र के रूप में हल मिला था इसलिए इसे हलषष्ठी भी कहा गया है.बलराम के जन्मदिन को माना जाता है हलष्ठी पर्व पर महिलाएं भगवान शिव पार्वती की पूजा -अर्चना करती है अपने बच्चे की लंबी आयु के लिए मनोकामना की जाती है. कथा श्रवण का क्रम शाम तक चलता रहा.

Updated : 9 Aug 2020 12:55 PM GMT
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