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केशकाल के लगभग 500 गांवों वाले 9 परगना में पूज्य देवता हैं डॉक्टर खान,हर साल लगता है दरबार, चढ़या जाता है अंडे का भोग।

केशकाल के लगभग 500 गांवों वाले 9 परगना में पूज्य देवता हैं डॉक्टर खान,हर साल लगता है दरबार, चढ़या जाता है अंडे का भोग।
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विचारक,शोधकर्त्ता,पुरातत्व के जानकार व वरिष्ठ पत्रकार केवलकृष्ण जी की कलम से----

डॉक्टर खान उस परंपरा से आते थे, जहां मूर्तिपूजा की इजाजत नहीं है। उन्हें क्या पता था कि एक रोज वह खुद भी मूर्ति में ढलकर देवता हो जाएंगे। उसी तरह पूजे जाएंगे, जैसे दूसरे देवी-देवता बस्तर में पूजे जाते हैं।

केशकाल के लगभग 500 गांवों वाले 9 परगना में पूज्य देवता हैं डॉक्टर खान। इस 9 परगाना की प्रमुख देवी भंगाराम के ठीक बाजू में उन्होंने स्थान पाया है।
भंगाराम का प्रताप इतना है कि इन सभी 500 गांवों के देवी-देवता उनके दरबार में हर साल हाजिरी बजाने आते हैं।

केशकाल घाटी में स्तिथ

रायपुर से जगदलपुर जाने वाली सड़क कांकेर के बाद 12 भांवर घाटी पर जैसे ही चढ़ती है, केशकाल शहर शुरू हो जाता है। इसीलिए यह घाटी केशकाल-घाट भी कही जाती है। घाट के ठीक ऊपर मां भंगाराम अपने प्रिय अनुचर डॉक्टर खान देव के साथ विराजमान हैं।
स्थानीय लोग बताते हैं कि आदिकाल की बात है। जब इलाके में महामारी फैली थी, तब बस्तर के राजा नागपुर से एक डॉक्टर को लेकर आए थे, वे डॉक्टर खान ही थे।

बीमारी से बचने करते है मिन्नत
बीमारी-महामारी से बचाव के लिए गांव के देवी-देवताओं की मनौतियां-मिन्नतें करने वाले ग्रामीणों ने देखा डॉक्टर खान के हाथों में जादू है। वे बीमार व्यक्ति को ठीक कर देने की ऐसी क्षमता रखते है, जैसी सिरहा-बैगा भी नहीं रखते।

डॉक्टर खान पर आलेख लिख चुके मेरे मित्र राजीव रंजन कहते हैं कि संभवतः डा. खान ने तब इलाज के लिए गांवों में प्रचलित धार्मिक प्रक्रियाओं का सहारा लिया होगा। संभव है कि दवाइयां प्रसाद के रूप में दी गई हों, क्योंकि तब ग्रामीणों को उनकी पारंपरिक मान्यताओं से एकाएक बाहर लाकर इलाज करना शायद संभव नहीं होता।
केशकाल के निवासी वरिष्ठ पत्रकार के.डी. उपाध्याय जी ने कल मुझे व्हाट्सएप पर कुछ वीडियो भेजे हैं। ये वीडियो भंगाराम जात्रा के हैं। इसी में एक वीडियो में डाक्टर खान देव भी नजर आ रहे हैं।
एक मुस्लिम डॉक्टर हिंदू पूजा-पद्धति में देव के रूप में कैसे स्थान पा गया, इस बारे में सिर्फ अनुमान ही लगाया जा सकता है, क्योंकि लोक तो इसे आदि काल की घटना बताता है। वह राजा कौन था, वह वर्ष कौन सा था, इस बारे में कुछ भी पता नहीं। इस कहानी में लोक-विश्वास के साथ ही चला जा सकता है, जहां उसके सारे देवी देवता आदि काल से उनके साथ हैं।
लेकिन ठहरिये, केशकाल की इस कहानी में जरूरी नहीं कि सभी देवी-देवताओं का आदिकाल एक साथ शुरू होता हो। कुछ का आदि काल हजार दो हजार साल पुराना भी हो सकता है, तो कुछ का सौ-दो सौ साल पुराना भी। कुछ का आदिकाल इसी साल भी शुरू हो सकता है। मां भंगाराम जैसा चाहेंगी।

मां भंगाराम देती है देवी-देवताओं को मान्यता

9 परगना के सभी 500 गांवों के अपने-अपने देवी-देवता हैं, जो बीमारियों और आपदाओं से इन गांवों की रक्षा करते हैं। इन सभी को मां भंगाराम ने ही नियुक्त किया है। भंगाराम-जात्रा के रोज इन सभी को देवी के दरबार में पेशी पर हाजिर होना पड़ता है। मां भंगाराम ने ही सभी देवताओं को अलग-अलग तरह की जिम्मेदारियां सौंपी हैं। वे ही निगरानी करती हैं कि देवी-देवता अपनी जिम्मेदारी निभा रहे हैं या नहीं। गैर-जिम्मेदार और लापरवाह देवी-देवताओं को वही दंडित भी करती हैं।

देवो का लगता है दरबार

मां भंगाराम के दरबार में ग्रामीणजन अपने-अपने देवी-देवाताओं के खिलाफ शिकायतें और आरोप लेकर उपस्थित होते हैं। यदि मां भंगाराम ने आरोप सही साबित पाया तो वे देवों को कारावास में डालने से भी नहीं हिचकतीं। यदि आरोप गंभीर प्रवृत्ति का हो, और साबित पाया हो, तो वे ऐसे देवों को मृत्युदंड भी देने से नहीं हिचकतीं।
कारावास की सजा पाए देवों को एक कूड़े के ढेर में फेंक दिया जाता है, वहीं जिन देवों को देवी निलंबित कर देती है, उसे देवी के दरबार के पास ही हिरासत में रखा जाता है।

वरिष्ठ पत्रकार केवलकृष्ण

500 गॉव के लोग आते है अपने देवो के साथ

देवों की कार्यप्रणाली के आंकलन-परीक्षण और सजा-सुनवाई का यह दौर हर साल भादो-जात्रा से शुरू होता है। शनिवार देवी का दिन है, इसीलिए जात्रा शनिवार से ही शुरू होता है। लगातार 6 शनिवार तक सेवा-पूजा होती है। सातवें शनिवार को जात्रा होता है। करीब 500 गांवों के लोग छत्र, डोली, डांग में अपने-अपने देवों को लेकर आते हैं। वे अपने गांवों के लिए सालभर की मंगल कामना करते हैं। मनौतियां मांगते हैं।

लगता है अंडे का भोग

किसी जमाने में यहां भैंस की बलि दी जाती थी, लेकिन अब बकरे-भेड़ की बलि दी जाती है। बलि में काटे गए बकरे का प्रसाद वहीं खाना पड़ता है। यहां के प्रसाद का छोटा सा टुकड़ा भी घर लेकर जाया नहीं जा सकता। यदि ऐसा हुआ तो आपदा आ सकती है। डॉ. खान चूंकि मुसलमान देवता हैं, शायद इसीलिए उन्हें अंडे का भोग लगाया जाता है। सभी देवों की तरह खान देव को भी जिम्मेदारी मिली है, उन्हें इस पूरे परगाना की महामारियों और बीमारियों से रक्षा करनी है। जैसा कि लोग बताते हैं कि डॉ.खान ने अब तक अपनी जिम्मेदारी बखूबी निभाई है।

(परगना= राजशाही के दौर में एक प्रशासनिक ईकाई, जैसे आजकल विकासखंड, तहसील आदि)

Updated : 8 Aug 2020 11:01 AM GMT
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