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कोरोना इफ़ेक्ट -महासमुंद के मंदिर में पहुंचने वाले भालू लौट रहे भूखे, वर्षो से मिल रहा था मंदिर से भोजन।

कोरोना इफ़ेक्ट -महासमुंद के मंदिर में पहुंचने वाले भालू लौट रहे भूखे, वर्षो से मिल रहा था मंदिर से भोजन।
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मंदिर के अंदर खाने की तलाश में भालू

ताहिर खान/कृष्णानंद दुबे
महासमुंद- कोरोना वायरस की महामारी ने पूरी दुनिया को अपने कब्जे में ले लिया है। चारों तरफ हाहाकार मचा है। सड़क से लेकर बाजार लॉक डाउन की घोषणा के बाद से सुनसान दिख रहे हैं। वहीं दूसरी ओर इंसानों के साथ साथ जानवरों को भी इस मुश्किल वक्त का सामना करना पड़ रहा हैं। हम बात कर रहे हैं महासमुंद जिले के चंडी माता मंदिर की जहां भालुओ का परिवार रोज आता था और श्रद्धालुओं द्वारा दिए गए खाने-पीने के सामान से अपना पेट भरता था, लेकिन मंदिर में ताला बंद हैं और लॉक डाउन को देखते हुुुए लोग अपने घरों में है जिसके चलते उन्हें भोजन पर्याप्त मात्रा में नहीं मिल रहा है। हालांकि पुजारी के द्वारा मंदिर में प्रतिदिन पूजा की जा रही है। भालुओ का परिवार निराश होकर लौट जाते हैं, फिर दूसरे रोज इसी उम्मीद में आते हैं कि आज कोई मिल जाए जो उनको खाना खिला दे, लगभग प्रतिदिन उन्हें निराशा हाथ लग रही हैं और भूखे पेट ही लौटना पड़ रहा है।

नही मिल पा रहा है भालुओ को भोजन।

भालूओ के लिए पूरे भारत मे प्रसिद्ध चंडी मंदिर ले चलेगे और बताएगें कि किस तरह यहाॅ कोरोना इफेक्ट का असर भालूओ और बंदरो पर पड़ा है। छत्तीसगढ़ मे महासमुंद जिले के घुॅचापाली पहाड़ी पर स्थित श्री चण्डी माता मंदिर भालूओ के नाम से प्रसिद्ध है। जंगल के बीच पहाड़ी के उपर स्थित इस मंदिर मे पिछले एक दशक से 3 से 5 भालू शाम को 4 बजे के बाद जंगल से निकलकर मंदिर परिसर मे नियमित आते है। कभी - कभी ये भालू मंदिर के अंदर देवी स्थल तक भी चले जाते है। देवी दर्शन के साथ इन भालूओ को देखने के लिए नियमित रूप से सैकड़ो लोग पूरे देश भर से आते है। नवरात्रि एवं अन्य पर्वो मे यह भीड़ प्रतिदिन हजारो की संख्या मे होती है। सबसे दिलचस्प यह है कि श्रद्धालु भक्तिभाव एवं उत्सुकता पूर्वक इन भालूओ के लिए भी खाने-पीने का सामान लाते है, जिन्हे ये बड़े चाव से खाते हैं,और फ्रुट जूस भी श्रद्धालुओ के हाथो से ही पी लेते है। आज तक ये भालू कभी किसी को नुकसान नही पहुॅचाए हैं। भालूओ की इसी सरलता और घुल मिल जाने के चलते मंदिर बहुत प्रसिद्ध हो गया और हमेशा यहाॅ भीड़ लगी रहती है। ये भालू प्रतिदिन 4 बजे के बाद मंदिर मे आते है और शाम की आरती के बाद जंगल मे वापस लौट जाते है। इस बीच इन्हे प्रतिदिन बहुत कुछ खाने पीने को मिल जाता है।

लॉक डाउन का असर
कोरोना के चलते लाकडाउन मे मंदिर परिसर तक श्रद्धालुओ का प्रवेश पूर्णतः बंद कर दिया गया है। मंदिर परिसर के साथ - साथ पहाड़ पर बने रास्ते भी वीरान है। सिर्फ मंदिर का स्टाफ ही वहाॅ रह रहा है। जिसके चलते पहली बार भालू और बंदर भी लाकडाउन के चलते प्रभावित हो रहे है। इन्हे अब सिर्फ जंगल और प्रकृति के भरोसे पेट पालना पड़ रहा है।

Updated : 13 April 2020 9:08 AM GMT
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