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राजमहल-रियासतकाल से लेकर सियासतकाल तक सर्वधर्म सद्भाव का केंद्र।

राजमहल-रियासतकाल से लेकर सियासतकाल तक सर्वधर्म सद्भाव का केंद्र।
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0 दीपावली में गौरा-गौरी,जंवारा से लेकर मोहर्रम का ताजिया अब भी पहुंचता है राजा के महल में।

ताहिर खान

कवर्धा- रियासत कालीन से लेकर सियासत काल तक ना जाने कितनी सदियां बीती और ना जाने कितने राजा-महाराजा भी बदले, लेकिन नहीं बदली तो राजमहल की एकता,सद्भावना की परंपरा। सदियों पुरानी रस्म की अदायगी पीढ़ी दर पीढ़ी से आज भी बदस्तूर जारी है। कवर्धा के राजमहल जिसे मोती महल भी कहा जाता है। यूं तो राजमहल अपनी खूबसूरती के लिए देश ही नहीं विदेश में भी ख्याति प्राप्त है, जिसे देखने के लिए विदेशी सैलानी भी बड़ी तादाद में पहुंचते हैं, राजमहल को सर्वधर्म सद्भाव का केंद्र भी माना जाता है। रियासत काल से जंवारा, दीपावली के अवसर पर गौरा-गौरी व मुहर्रम के दौरान निकलने वाले ताजिया आज भी राजमहल परिसर में पहुंचता है, जहां पुरानी परंपरा के अनुसार नारियल भेंट व पूजा-अर्चना किया जाता है, अपने आप में या बेहद अनूठा है कि कई दौर गुजरे कई परिस्थितियां बनती बिगड़ती गई, लेकिन कवर्धा के राजमहल की परंपरा आज भी आपसी सद्भाव व मोहब्बत का संदेश देना नहीं भूला, हर किसी को जोड़कर रखना राजमहल की परंपरा रहा है। राजा योगेश्वर राज सिंह ,रानी कीर्ति देवी अभी तक इस परंपरा को कायम रखे हुए हैं, अब इस परंपरा को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी युवराज मैखलेश्वर सिंह के कंधों पर हैं जो बेहद करीब से इन सभी तीज त्योहारों के अवसर पर राजमहल के परिसर के अंदर होने वाले परंपराओं पर नजर रखते हैं और इस में बढ़ चढ़कर हिस्सा ले रहे हैं।


राजमहल के बारे में.....

सकरी नदी के तट पर बसे कवर्धा नगर पर पहले नागवंशी और हैह्यवंशी शासकों का शासन था। भोरमदेव मंदिर के अलावा इटैलियन मार्बल से बना राज महल की खूबसूरती विश्वप्रसिद्ध है। इसका निर्माण महाराजा धर्मराज सिंह ने 1936-39 ई. में कराया था। 11 एकड़ में फैले इस महल के दरबार के गुम्बद पर सोने और चांदी से नक्काशी की गई है। महाबलि सिंह, उजियार सिंह, टोकसिंह, बहादुर सिंह, रूपकुंवर, गौरकुंवर, राजपाल सिंह, पदुमनाथ सिंह, देवकुमारी, धर्मराज, विश्वराज के बाद जब योगेश्वरराज सिंह राजमहल की जिम्मेदारी संभाल रहे है। महल में लगभग अनेक तरह की तलवारें मौजूद हैं। इसके अलावा युद्ध में प्रयुक्त होने वाली बंदूकें, कई जानवरों के सिर, बेशकीमती कपड़े, टोपियां, छड़ियां, सोने-चांदी के बर्तन, छुरी और कांटों का अनोखा संग्रह भी है।


दशहरा में लगता है राज दरबार


पुरानी परंपरा के अनुसार राजा योगेश्वर राज सिंह के पूर्वजों के जमाने से चला आ रहा दशहरा के दौरान राजा का दरबार लगने की परंपरा आज भी जारी है। दशहरा के दिन राजा, युवराज के साथ शहर का भ्रमण करने के लिए अपने शाही रथ में सवार होकर प्रतिवर्ष निकलते हैं और रियासत की जनता से भेंट मुलाकात करते हैं जिसके बाद महल में राजा का दरबार लगता है जहां लोग पहुंचकर राजा से मुलाकात कर उन्हें नारियल व अन्य सामग्री भेंट करते हैं, यह परंपरा सदियों से चली आ रही है जो अब भी कायम है।


शोक संवेदना देने पहुंचे डॉ रमन सिंह


राजमहल लंबे समय तक सियासत का केंद्र बना रहा, बिना राज महल के कवर्धा में कोई राजनीति नहीं हो पाती थी। रामराज परिषद से लेकर नेशनल कांग्रेस पार्टी तक का सफर राजमहल ने तय किए हैं पूर्व विधायक और कवर्धा रियासत की महारानी रानी शशि प्रभा देवी का निधन कुछ दिनों पूर्व हुआ था, जिन्हें श्रद्धांजलि एवं शोक संवेदना प्रकट करने के लिए पूर्व मुख्यमंत्री डॉ रमन सिंह अपनी पत्नी वीणा सिंह के साथ राजमहल पहुंचे इस दौरान वे बीते हुए दिनों को याद करते हुए राजा विधायक राजा योगेश्वर राज के साथ लंबी चर्चा भी की।

Updated : 2020-11-15T22:00:05+05:30
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